Posts

Showing posts from October, 2015

वक़्त और सफर

वक़्त के कितने रंग है, शायद समझ आता | बैठे न होते खामोश और कुछ कह पता || ऑंखें तो यु बंद और खुलती है ख्वाबो के सहारे भी काश उजालो में दुनिया के शोर से जग जाता ||
कुछ दूर ही था मंज़िल का वो लम्हा जिन राहो पे हम चल पड़े थे। कुछ अनजाना - कुछ जाना सा लग रहा था हर मोड़, जब ये आँखे ख्वाबो से लिपट पड़े थे

बेबसी

डुबो देती है हर आँशु आँखों को बड़ी ही ख़ामोशी से। और हम दिल का दर्द किसी को दिखा भी नही पाते। सोचते है शायद वक़्त का इल्म ही यही है ।। जो किसी को चाह कर भी  समझा नही पाते।। खुद की पर...