वक़्त के कितने रंग है, शायद समझ आता | बैठे न होते खामोश और कुछ कह पता || ऑंखें तो यु बंद और खुलती है ख्वाबो के सहारे भी काश उजालो में दुनिया के शोर से जग जाता ||
डुबो देती है हर आँशु आँखों को बड़ी ही ख़ामोशी से। और हम दिल का दर्द किसी को दिखा भी नही पाते। सोचते है शायद वक़्त का इल्म ही यही है ।। जो किसी को चाह कर भी समझा नही पाते।। खुद की पर...