मौसम तो हसी है, मगर वक़्त के दायरे है | दिलकश तो दिल है, मगर जुबा के दायरे है | कोई पहचान है मगर सोच के दायरे है | उलझी है नज़्म दिल कि, मगर नजरो के दायरे है | चलती है कदम, मगर सफ़र के दायरे है | छोड़ दू अगर कार्ल कि बात तो क्या होगा | अब हर तरफ तो अपनी एहसासों के दायरे है |
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Showing posts from October, 2018
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अभी रात काफी है ,मेरे दिल की बात बाकी है जुल्फ जो इतने घने है, "की" मेरे आँखों की सब्र रात बाकी है इतना ना उलझाओ खुद को ,अभी मेरे एहसास बाकी है तू चाँद को देख घबरा मत जाना ,मेरी निगाहो का महताब बाकी है तेरे तल्कियो और मोहब्बत को पिरो कर रखा हुँ इस खँडहर दिल में शायद सांसो में उस वक़्त की कुछ सौगात बाकी है
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जब पी है बड़ी हसरत से पी, नसे को नसे समझ के नही पी है | अन्द्जे जुदा हो जाता है हमरा जब भी करीब रहा क पी है| कदम साथ देते नही मगर हौसला बुलंद करके पी है गजब मज़ा है इन प्यालो के हर एक गुट में भी उतरने से पहले एक गुट बड़ा के पी है सच कहू दोस्तों तो हर एक दर्द भुला देता है| जब भी दर्द को दर्द समझा के पी के पी है |
आंगन
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मेरा आंगन छोटा था, मगर अंचल का एक कोना ही बड़ा था, बहुत छुपाया के रखा हर अदात को मेरी क्यों की मै ही उनके गोद में खड़ा था झुझलाया गुसाया हर मोड़पे ही मगर प्यार से हमें समझया था जब भी दर्द से करहा, लब पे माँ का ही नाम आया था कितने बदल देते है हम हर आदतों को, जिन आदतों का उन्होंने पीड़ा उठाया था माँ तेरे दर्द का वजह भी मै हु, तेरे मर्ज का वजह भी मै हूँ मगर तू क्या कर सकती, जब पास हो कर भी दूर खड़ा था माँ तेरे अचल एक कोना ही बड़ा था |