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Showing posts from October, 2018
मौसम तो हसी है, मगर वक़्त के दायरे है | दिलकश तो दिल है, मगर जुबा के दायरे है | कोई पहचान है मगर सोच के दायरे है | उलझी है नज़्म दिल कि, मगर नजरो के दायरे है | चलती है कदम, मगर सफ़र के दायरे है | छोड़ दू अगर कार्ल कि बात तो क्या होगा | अब हर तरफ तो अपनी एहसासों के दायरे है |
वक़्त गुजरता जा रहा है अपने काफिले मे जीने की सौगात लेकर . बड़ी दूर तलक आशिया बनाये है किसी की एहसासो का एहसास लेकर हमसे मिटती नहीं उनकी हर एक अंजुमन हांथो मे किताब लेकर  बस अंशुओ से कुछ शब्द बदल गये जिंदगी का हिसाब लेकर
कोई सीखा रहा था मोहब्त करने कि शबब पर वक़्त का कोई हमे तकाजा ना था  बस सब भूल कर हम लिपटे रहे उनके हर एक दर्मिया से  जिसका हमे कोई अंदाजा ना था कोई कशिश  ही उनकी खीच लाती थी अपनी तरफ वरना उस मोड पे कभी हमे आना ना था
अभी रात काफी है ,मेरे दिल की बात बाकी है जुल्फ जो इतने घने है, "की" मेरे आँखों की सब्र रात बाकी है  इतना ना उलझाओ खुद को ,अभी मेरे एहसास बाकी है  तू चाँद को देख घबरा मत जाना ,मेरी निगाहो का महताब बाकी है तेरे तल्कियो और मोहब्बत को पिरो कर रखा हुँ इस खँडहर दिल में  शायद सांसो में उस वक़्त की कुछ सौगात बाकी है
हमारी मंजर ही हमसे सवाल पूछ पड़ी है | इस जिनदगी की दौड़ में न जाने कितने मोड़ छुट पड़ी है | कोई तो कहता है हम पागल है,तो कोई कहता है हमें समझ नही  मगर किसी को क्या मालूम हमरी हसरत ही हम पे रो पड़ी | बड़ी मुस्किल है खुद को समझा पाना इन बदलते वक़्त में  की मेरी जिन्दगी किस तरफ चल पड़ी है |
जब पी है बड़ी हसरत से पी, नसे को नसे समझ के नही पी है | अन्द्जे जुदा हो जाता है हमरा जब भी करीब रहा क पी है| कदम साथ देते नही मगर हौसला बुलंद करके पी है  गजब मज़ा है इन प्यालो के हर एक गुट में भी  उतरने से पहले एक गुट बड़ा के पी है  सच कहू दोस्तों तो हर एक दर्द भुला देता है| जब भी दर्द को दर्द समझा के पी के पी है |
बेकौफ थी जिन्दगी मेरी मगर अब तो सुकून छीन लिया  एक जिन्दगी की तलास में खुद को ही खुद से कितना दूर कर लिया  रो लेता हु बीते वक़्त को याद कर के कि आज किस मोड़ खुद खड़ा कर लिया मफिल भी है मुस्कान भी है चहरे पे हज़ार मगर वक़त के आगे कितना गुनाह कर लिया
चलो मन जाये घर अपने,इस परदेश में पदेश क्यों परदेशी रहे आंख जो भाए कोरा सपना सरे पराय है कोई ना अपना, ऐसे मन में क्यों है रहना चलो मन जाये घर अपने, सचे प्रेम का जोत जला के, मन सुन मेरी कान लागा के, पाप और पुन्य की गठरी उठा के, अपनी रह चले , चलो मन जाये घर अपने

आंगन

मेरा आंगन छोटा था, मगर अंचल का एक कोना ही बड़ा था, बहुत छुपाया के रखा हर अदात को मेरी क्यों की मै ही उनके गोद में खड़ा था झुझलाया गुसाया हर मोड़पे ही मगर प्यार से  हमें समझया था जब भी दर्द से करहा, लब पे माँ का ही नाम आया था कितने बदल देते है हम हर आदतों को, जिन आदतों का उन्होंने पीड़ा उठाया था माँ तेरे दर्द का वजह भी मै हु, तेरे मर्ज का वजह भी मै हूँ मगर तू क्या कर सकती, जब पास हो कर भी दूर खड़ा था माँ तेरे अचल एक कोना ही बड़ा था |

नजर

कभी हम उनसे तो कभी ओ हमसे नजर चुराते रहे पलके सिमेट कर ना जानें क्यू हम दोनों शरमाते रहे दिल में कुछ हलचल तो थी मगर उसे भी हम समझाते रहे तब आईना भी देखना गवारा नही था क्यों कि खुद को ही खुद कि नजरो से हर पल बचाते रहे