हमारी मंजर ही हमसे सवाल पूछ पड़ी है |
इस जिनदगी की दौड़ में न जाने कितने मोड़ छुट पड़ी है |
कोई तो कहता है हम पागल है,तो कोई कहता है हमें समझ नही 
मगर किसी को क्या मालूम हमरी हसरत ही हम पे रो पड़ी |
बड़ी मुस्किल है खुद को समझा पाना इन बदलते वक़्त में 
की मेरी जिन्दगी किस तरफ चल पड़ी है |

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