आंगन

मेरा आंगन छोटा था, मगर अंचल का एक कोना ही बड़ा था,
बहुत छुपाया के रखा हर अदात को मेरी क्यों की मै ही उनके गोद में खड़ा था
झुझलाया गुसाया हर मोड़पे ही मगर प्यार से हमें समझया था
जब भी दर्द से करहा, लब पे माँ का ही नाम आया था
कितने बदल देते है हम हर आदतों को, जिन आदतों का उन्होंने पीड़ा उठाया था
माँ तेरे दर्द का वजह भी मै हु, तेरे मर्ज का वजह भी मै हूँ
मगर तू क्या कर सकती, जब पास हो कर भी दूर खड़ा था
माँ तेरे अचल एक कोना ही बड़ा था |

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