वक़्त और सफर
वक़्त के कितने रंग है, शायद समझ आता |
बैठे न होते खामोश और कुछ कह पता ||
ऑंखें तो यु बंद और खुलती है ख्वाबो के सहारे भी
काश उजालो में दुनिया के शोर से जग जाता ||
बैठे न होते खामोश और कुछ कह पता ||
ऑंखें तो यु बंद और खुलती है ख्वाबो के सहारे भी
काश उजालो में दुनिया के शोर से जग जाता ||
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