कुछ दूर ही था मंज़िल का वो लम्हा जिन राहो पे हम चल पड़े थे।
कुछ अनजाना - कुछ जाना सा लग रहा था हर मोड़, जब ये आँखे ख्वाबो से लिपट पड़े थे
हमारी मंजर ही हमसे सवाल पूछ पड़ी है | इस जिनदगी की दौड़ में न जाने कितने मोड़ छुट पड़ी है | कोई तो कहता है हम पागल है,तो कोई कहता है हमें समझ नही मगर किसी को क्या मालूम हमरी हसरत ही हम पे रो पड़ी | बड़ी मुस्किल है खुद को समझा पाना इन बदलते वक़्त में की मेरी जिन्दगी किस तरफ चल पड़ी है |
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