कुछ दूर ही था मंज़िल का वो लम्हा जिन राहो पे हम चल पड़े थे।
कुछ अनजाना - कुछ जाना सा लग रहा था हर मोड़, जब ये आँखे ख्वाबो से लिपट पड़े थे

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