चलो मन जाये घर अपने,इस परदेश में पदेश क्यों परदेशी रहे
आंख जो भाए कोरा सपना सरे पराय है कोई ना अपना, ऐसे मन में क्यों है रहना
चलो मन जाये घर अपने,
सचे प्रेम का जोत जला के, मन सुन मेरी कान लागा के,
पाप और पुन्य की गठरी उठा के, अपनी रह चले ,
चलो मन जाये घर अपने

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