दिल ही दिल से

बहुत चाह है अपनी "ख्वाबो और उम्मीदो"ं से मगर क़द्र किसका करू।।
ढूंडता हूँ हर मंजील को "वक़्त और हांथो" के लकीरो से मगर यकीन किसका करू।।
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मुददते तो बहुत मिली, जिंदगी बनाने की
मगर जिंदगी से ही ,डर लगता है ।।
ढलती है शाम "जब" उजालो से लिपट कर
ना जाने क्यु फिर "उजालो" से डर लगता है।।
सोचता हुँ मिटा दू "हर एक उन लम्हों"को अपनी जिंदगी से
तो आँखों में किसी के "आंसू " लाने से डर लगता है।।
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ना जाने हमें ऐसा हर कदम पे लगता है,हर कदम पे लगता है
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बदलती दुनिया की , हर लब्ज़ दीवानी है।
कोई कहता है , ये रिश्ता पुरानी है।।
तो कोई कहता है , दुनिया ही बेगानी है।।।
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चांदनी रात में,ख्वाबो से डर लगता है।
सफर में अपने  जज्बातों से,डर लगता है।।
ना जाने कब तक किसी की याद आएगी ।
यही सोच कर हर पल "जी कर" भी एक पल से डर लगता है
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कभी उलझन भरे ख्वाब ,तो कभी उलझन भरे चाह
हमेशा जुबा को बंद कर देती है।।
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कभी मुजरिम नजर आता हुँ ,वक़्त के पैमानों में।
कभी खुद ही सम्भल जाता हुँ, वक़्त के पैमानों में।।
तो कभी दूर निकल जाता हुँ, वक़्त के पैमानों में।
बहुत ही तहज़ीब है,अपनी जिंदगी की है हर सफर से।
जो चलता हुँ सम्भल कर किसी के वास्ते वक़्त के पैमानों में।।

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