ख्याल

गुजरे ज़माने की हर बात ढूंढ़ता हुँ |
भूल बैठा हूँ  पर दिन रात  ढूंढ़ता हुँ  ||
मेरी जिंदगी किस मोड़ पे है, ये हालात  ढूंढ़ता हुँ ।
राहो  में दिन रात  ढूंढ़ता हुँ  ।
कोई पल नही "जो निकल जाऊ " उस मोड़  से ।
बस  आँखे नाम न हो "वो " जजबात ढूंढ़ता हुँ ।।
कई सफर बिताये  वक़्त के साथ मगर ,
फिर भी हर मोड़ पे, अपनी कयानात ढूंढ़ता हुँ ॥
रुक सी गयी है हालात की हर वो  रंग जिन्हे मै हर शाम ढूंढ़ता हुँ ।
मेरी तक़दीर का  कोई फ़साना लिख दिया
जो मुकमल थी हांथो की गह्रइयो में मै वही लकीर ढूंढ़ता हुँ ॥
आज हम खुद  को तन्हाइयो में महसूस करे भी  किसके साथ
न वफ़ा रहा ,न सुकून रहा
मेरी आँखे जो नम है उसकी वजह ढूंढ़ता हुँ
खुदा जो भी करता है, नही करता खुद के बदौलत
बस उसकी एक इंतहा का सफर ढूंढ़ता हुँ
बदलेगी दुनिया हमरी भी ये तो यकीन है
बस कौन सा सफर होगा और कैसा  मुसाफिर
इन्ही ख्यालातों में खुद को मैं  हर दम ढूंढ़ता हुँ

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