सोचा न था

जिन किनारों पे अपना घर ना था  |
वही मंजिल बना लिया 
दूर तक चलने को कदम भी बढ़ा लिया
जिन चिरागों से डर था जल जाने का
उन्ही को किस्मत बना लिया 

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